उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को एक वर्ष पूर्ण संविधान की आत्मा को ज़मीन पर उतारने वाला कानून है UCC : पूरण चंद्र पांडे
उत्तराखण्ड
27 जनवरी 2026
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को एक वर्ष पूर्ण संविधान की आत्मा को ज़मीन पर उतारने वाला कानून है UCC : पूरण चंद्र पांडे
रामनगर I उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) ने आज अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है, और इसके लागू होने के बाद से राज्य में कानूनी और सामाजिक बदलावों की एक नई शुरुआत हुई है। यह संहिता न केवल कानून के क्षेत्र में सुधार का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 की दिशा में भी एक ठोस कदम है, जो कहता है, “राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।”
टैक्स बार एसोसिएशन, रामनगर के अध्यक्ष पूरण चंद्र पांडे ने इस अवसर पर कहा, “समान नागरिक संहिता न केवल एक कानूनी दस्तावेज़ है, बल्कि यह भारतीय संविधान की आत्मा को साकार करने वाला कानून है। अनुच्छेद 44 के तहत जिस समानता और न्याय की बात की गई है, वही UCC के रूप में सामने आई है। अब उत्तराखंड के नागरिकों के लिए न्याय सिर्फ धर्म या जाति पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि यह उनके नागरिक अधिकारों पर आधारित होगा।”
वही टैक्स बार एसोसिएशन, रामनगर के उपसचिव मनु अगरवाल ने कहा की , “UCC ने समाज के हर वर्ग, खासकर महिलाओं को अधिकारों का सम्मान दिलाने की दिशा में अहम कदम उठाया है। इससे न केवल कानूनी असमानताएँ समाप्त हुई हैं, बल्कि पारिवारिक और वैवाहिक कानूनों में न्यायपूर्ण समानता की ओर भी बढ़ाया गया है।” इस संहिता के लागू होने के एक साल में, लाखों नागरिकों ने इसके प्रावधानों को अपनाया है, जिससे यह साबित होता है कि राज्य में संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत निर्धारित समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को लोगों ने महसूस किया है।
हाई कोर्ट अधिवक्ता पूरण चंद्र पांडे ने कहा, “डिजिटल प्रक्रिया, पारदर्शिता और न्यायिक प्रणाली की सुगमता ने इस कानून को साकार किया है, और इसे समाज ने खुले दिल से स्वीकार किया है।” हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि “किसी भी कानूनी बदलाव में चुनौतियाँ आती हैं। UCC को लागू करते समय कुछ स्थानों पर प्रशासनिक और कानूनी व्यावहारिकता से जुड़ी समस्याएँ हो सकती हैं, लेकिन इन्हें हल करने के लिए निरंतर संवाद और सुधार जरूरी हैं। यही समय की माँग है।”
हाई कोर्ट अधिवक्ता मनु अग्रवाल ने कहा, “यह कानून केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में समान नागरिक संहिता के मॉडल के रूप में इसे लागू करने का रास्ता खोलेगा। यह कदम न केवल हमारे संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुरूप है, बल्कि यह समाज में न्याय और समानता की स्थापना का अहम साधन बनेगा।


